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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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पराशर उवाच
असङ्गः श्रेय़सो मूलं ज्ञानं ज्ञानगतिः परा |  ३   क
चीर्णं तपो न प्रणश्येद्वापः क्षेत्रे न नश्यति ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति