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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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पराशर उवाच
यथा समुद्रमभितः संस्यूताः सरितोऽपराः |  ३२   क
तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंस्यूय़ते सदा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति