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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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मनुरु उवाच
प्रजाः सृष्टा मनसा कर्मणा च; द्वावप्येतौ सत्पथौ लोकजुष्टौ |  १२   क
दृष्ट्वा कर्म शाश्वतं चान्तवच्च; मनस्त्यागः कारणं नान्यदस्ति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति