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शान्ति पर्व
अध्याय २८७
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पराशर उवाच
स्वरूपतामात्मकृतं च विस्तरं; कुलान्वय़ं द्रव्यसमृद्धिसञ्चय़म् |  ४४   क
नरो हि सर्वो लभते यथाकृतं; शुभाशुभेनात्मकृतेन कर्मणा ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति