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वन पर्व
अध्याय २८७
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जनमेजय़ उवाच
किं तद्गुह्यं न चाख्यातं कर्णाय़ेहोष्णरश्मिना |  १   क
कीदृशे कुण्डले ते च कवचं चैव कीदृशम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति