वन पर्व  अध्याय २८७

वैशम्पाय़न उवाच

अमानय़न्हि मानार्हान्वातापिश्च महासुरः |  १७   क
निहतो व्रह्मदण्डेन तालजङ्घस्तथैव च ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति