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वन पर्व
अध्याय २८७
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽय़ं वत्से महाभार आहितस्त्वय़ि साम्प्रतम् |  १८   क
त्वं सदा निय़ता कुर्या व्राह्मणस्याभिराधनम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति