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वन पर्व
अध्याय २८७
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वैशम्पाय़न उवाच
जानामि प्रणिधानं ते वाल्यात्प्रभृति नन्दिनि |  १९   क
व्राह्मणेष्विह सर्वेषु गुरुवन्धुषु चैव ह ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति