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वन पर्व
अध्याय २८७
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा प्रेष्येषु सर्वेषु मित्रसम्वन्धिमातृषु |  २०   क
मय़ि चैव यथावत्त्वं सर्वमादृत्य वर्तसे ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति