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वन पर्व
अध्याय २८७
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वैशम्पाय़न उवाच
न ह्यतुष्टो जनोऽस्तीह पुरे चान्तःपुरे च ते |  २१   क
सम्यग्वृत्त्यानवद्याङ्गि तव भृत्यजनेष्वपि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति