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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
क्षेपाभिमानादभिषङ्गव्यलीकं; निगृह्णाति ज्वलितं यश्च मन्युम् |  ११   क
अदुष्टचेता मुदितोऽनसूय़ुः; स आदत्ते सुकृतं वै परेषाम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति