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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
सदाहमार्यान्निभृतोऽप्युपासे; न मे विवित्सा न च मेऽस्ति रोषः |  १९   क
न चाप्यहं लिप्समानः परैमि; न चैव किञ्चिद्विषमेण यामि ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति