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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
यस्य वाङ्मनसी गुप्ते सम्यक्प्रणिहिते सदा |  २४   क
वेदास्तपश्च त्यागश्च स इदं सर्वमाप्नुय़ात् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति