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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
प्राज्ञ एको रमते व्राह्मणानां; प्राज्ञ एको वहुभिर्जोषमास्ते |  ४२   क
प्राज्ञ एको वलवान्दुर्वलोऽपि; प्राज्ञ एषां कलहं नान्ववैति ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति