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शान्ति पर्व
अध्याय २८८
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हंस उवाच
वाक्साय़का वदनान्निष्पतन्ति; यैराहतः शोचति रात्र्यहानि |  ९   क
परस्य नामर्मसु ते पतन्ति; तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति