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वन पर्व
अध्याय २८८
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वैशम्पाय़न उवाच
सुमहत्यपराधेऽपि क्षान्तिः कार्या द्विजातिभिः |  १५   क
यथाशक्ति यथोत्साहं पूजा ग्राह्या द्विजोत्तम ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति