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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
कथं भ्रातॄन्हताञ्श्रुत्वा भर्तारं च स्वसा मम |  ३५   क
रोरूय़माणा दुःखार्ता दुःशला सा भविष्यति ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति