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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
शव्दः स्पर्शोऽथ रूपं च रसो गन्धस्तथैव च |  २९   क
विज्ञेय़ं व्यापकं चित्तं तेषु सर्वगतं मनः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति