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शान्ति पर्व
अध्याय २८९
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भीष्म उवाच
अरतिं दुर्जय़ां चैव घोरां तृष्णां च पार्थिव |  ४८   क
स्पर्शान्सर्वांस्तथा तन्द्रीं दुर्जय़ां नृपसत्तम ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति