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शान्ति पर्व
अध्याय २८९
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भीष्म उवाच
यथा कश्चिद्वनं घोरं वहुसर्पसरीसृपम् |  ५१   क
श्वभ्रवत्तोय़हीनं च दुर्गमं वहुकण्टकम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति