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वन पर्व
अध्याय २८९
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु राजा द्विजं दृष्ट्वा तत्रैवान्तर्हितं तदा |  २३   क
वभूव विस्मय़ाविष्टः पृथां च समपूजय़त् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति