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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्मै वह्निर्वरान्प्रादात्ततो वव्रे वरान्गय़ः |  १०५   क
ददतो मेऽक्षय़ा चास्तु धर्मे श्रद्धा च वर्धताम् ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति