अनुशासन पर्व  अध्याय १४

उपमन्युरु उवाच

हंसकुन्देन्दुसदृशं मृणालकुमुदप्रभम् |  १०६   क
वृषरूपधरं साक्षात्क्षीरोदमिव सागरम् ||  १०६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति