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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
दर्शेन पौर्णमासेन चातुर्मास्यैः पुनः पुनः |  १०७   क
अय़जत्स महातेजाः सहस्रं परिवत्सरान् ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति