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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणेभ्यो ददौ निष्कान्सदसि प्रतते नृपः |  ११७   क
तुभ्यं तुभ्यं निष्कमिति यत्राक्रोशन्ति वै द्विजाः |  ११७   ख
सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा व्राह्मणान्स्म प्रपद्यते ||  ११७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति