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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
षष्टिः पुत्रसहस्राणि यं यान्तं पृष्ठतोऽन्वय़ुः |  १२३   क
नक्षत्रराजं वर्षान्ते व्यभ्रे ज्योतिर्गणा इव ||  १२३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति