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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रथय़िष्यति वै लोकान्पृथुरित्येव शव्दितः |  १३०   क
क्षताच्च नस्त्राय़तीति स तस्मात्क्षत्रिय़ः स्मृतः ||  १३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति