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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
एतच्चैवं न चेत्कालो मामाक्रम्य स्थितो भवेत् |  ३८   क
पातय़ेय़महं त्वाद्य सवज्रमपि मुष्टिना ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति