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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
यः स्पर्धामनय़च्छक्रं देवराजं शतक्रतुम् |  १७   क
शक्रप्रिय़ैषी यं विद्वान्प्रत्याचष्ट वृहस्पतिः |  १७   ख
संवर्तो याजय़ामास यं पीडार्थं वृहस्पतेः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति