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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
येष्वहःसु तव व्रह्मन्सलिलेच्छा भविष्यति |  ३३   क
तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णाः पय़ोधराः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति