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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
रामं दाशरथिं चैव मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |  ४६   क
योऽन्वकम्पत वै नित्यं प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति