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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तस्मात्तं परिपप्रच्छ नान्यं कञ्चिद्विशेषतः |  ९६   क
तस्मिंस्तस्य हि सत्याशा वाल्यात्प्रभृति पाण्डवे ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति