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शल्य पर्व
अध्याय २१
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सञ्जय़ उवाच
यथा सैन्येन रजसा समुद्धूतेन वाहिनी |  ५   क
प्रत्यदृश्यत सञ्छन्ना तथा वाणैर्महात्मनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति