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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
संवृद्धो युवनाश्वस्य जठरे यो महात्मनः |  ७५   क
पृषदाज्योद्भवः श्रीमांस्त्रिलोकविजय़ी नृपः ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति