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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
य आङ्गारं हि नृपतिं मरुत्तमसितं गय़म् |  ८१   क
अङ्गं वृहद्रथं चैव मान्धाता समरेऽजय़त् ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति