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वन पर्व
अध्याय २०७
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अग्निरु उवाच
निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्निः प्रथमो भव |  १५   क
भविष्यामि द्वितीय़ोऽहं प्राजापत्यक एव च ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति