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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
तेजसा तु तदा व्याप्ते दुर्निरीक्ष्ये समन्ततः |  ११३   क
पुनरुद्विग्नहृदय़ः किमेतदिति चिन्तय़म् ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति