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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्तारं चापि सम्पूज्य पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् |  ३०   क
तैः सार्धं नृपतिं वृद्धं ततस्तं पर्युपासताम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति