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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रय़ाणं घुष्यतां चैव श्वोभूत इति मा चिरम् |  २४   क
क्रिय़न्तां पथि चाप्यद्य वेश्मानि विविधानि च ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति