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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
आविष्टा इव शोकेन नाभ्यनन्दन्त किञ्चन |  ३   क
सम्भाष्यमाणा अपि ते न किञ्चित्प्रत्यपूजय़न् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति