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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुस्मरन्तो जननीं ततस्ते कुरुनन्दनाः |  ५   क
कथं नु वृद्धमिथुनं वहत्यद्य पृथा कृशा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति