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वन पर्व
अध्याय २९
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प्रह्लाद उवाच
अस्थाने यदि वा स्थाने सततं रजसावृतः |  १७   क
क्रुद्धो दण्डान्प्रणय़ति विविधान्स्वेन तेजसा ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति