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वन पर्व
अध्याय २९
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प्रह्लाद उवाच
काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः |  २३   क
स वै सुखमवाप्नोति लोकेऽमुष्मिन्निहैव च ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति