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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
कृतं कार्यं महाराज त्वय़ा मम परन्तप |  ३२   क
क्षीणः शापः सुकृच्छ्रो मे त्वय़ा सम्भाष्य साधुना ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति