सौप्तिक पर्व  अध्याय ४

कृप उवाच

एवमुक्तस्ततो द्रौणिर्मातुलेन हितं वचः |  २०   क
अव्रवीन्मातुलं राजन्क्रोधादुद्वृत्य लोचने ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति