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विराट पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्क्षिप्रं विनिर्यामो योजय़ित्वा वरूथिनीम् |  १५   क
विभज्य चाप्यनीकानि यथा वा मन्यसेऽनघ ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति