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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
सहदेवोऽपि कौरव्य रजोमेघे समुत्थिते |  ६१   क
एकाकी प्रय़यौ तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति