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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
स्यालस्तु तव सङ्क्रुद्धो माद्रीपुत्रं हसन्निव |  ६   क
कर्णिनैकेन विव्याध हृदय़े निशितेन ह ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति