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द्रोण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
ततो व्यूढान्यनीकानि तव तेषां च भारत |  १७   क
शनैरुपेय़ुरन्योन्यं योत्स्यमानानि संय़ुगे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति