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कर्ण पर्व
अध्याय २७
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सञ्जय़ उवाच
मित्रध्रुङ्मद्रको नित्यं यो नो द्वेष्टि स मद्रकः |  ७३   क
मद्रके सङ्गतं नास्ति क्षुद्रवाक्ये नराधमे ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति